कहीं यह बरसात फिर कोई आफत बनकर न बरसे…

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नैनीताल। मानसून का सीजन शुरू हो चुका है और पहाड़ों में आफत की बारिश बरसना शुरू हो गई है। जगह-जगह भूस्खलन की घटनाएं देखने को मिल रही हैं। वहीं इन घटनाओं के होने पर ही एक बात और सामने आ रही है जो हमारे सरकारी सिस्टम पर सवाल उठाती है। बात नैनीताल जिले की करें तो यहां करीब 3 महीने पहले से बड़े जोर शोर से आपदा प्रबंधन की बड़ी-बड़ी बैठकें बुलाई जा रही थी और बारिश के दिनों में होने वाले नुकसान की स्थिति से निपटने के लिए उच्चाधिकारियों द्वारा निर्देश दिए जा रहे थे, लेकिन शुरुआती बरसात ने ही पूरे सिस्टम की पोल खोल दी।

हाल ही में नैनीताल के हनुमानगढ़ क्षेत्र के पास हुए भूस्खलन की घटना में करीब 4 घंटे तक यातायात प्रभावित रहा मलबा हटाने वाली जेसीबी की मशीन के पास ड्राइवर तक नहीं था जिससे यातायात बहाल होने में काफी वक्त लग गया। वहीं पिछले साल अक्टूबर माह में आई आपदा में ठंडी रोड पर बड़ी मात्रा में मलबा गिर गया था जिससे करीब 6 महीने तक रोड पर आवाजाही बंद कर दी गई थी। जिला प्रशासन ने सिंचाई विभाग को करीब 12 लाख के बजट से ठंडी रोड पर ट्रीटमेंट का कार्य करने का जिम्मा सौंपा। जो कि अभी भी पूरा नहीं किया गया है। रोड के स्थाई ट्रीटमेंट का काम कब तक पूरा होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता है। लेकिन आम लोगों की चिंता तो यह है कि कहीं यह बरसात फिर से आफत ना लाए….

अक्टूबर माह, साल 2021 का वह मंजर शायद अभी भी लोगों के दिलों में दहशत पैदा कर देता है। प्रिंट मीडिया से जुड़े पत्रकार दीपक सिंह नेगी ने अपनी ग्राउंड रिपोर्टिंग के जरिए इस भयावह वृतांत के बारे में कुछ इस तरह बताया था…

“बात पिछले साल अक्तूबर की है। रात में आसमान से बरसी आफत ने घरों में सोये कई लोगों को चिरनिंद्रा में सुला दिया। शायद 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद यह अब तक का सबसे भयानक मंजर रहा था। मैं तब हल्द्वानी में था। ऐसी बरसात मैंने अपने जीवन के 30 बसंतों में पहली बार देखी। काम निपटाने के बाद बाहर चाय या कुछ खाने के लिए बाहर आया था तो चारों ओर सन्नाटा और यह सन्नाटा भी ऐसा कि इंसान सिहर उठे। ऑफिस से मेरा कमरा महज 120-130 मीटर में था लेकिन वहां तक पहुंचना मेरे लिए उस रात किसी चुनौती से कम नहीं रहा। घुटनों तक हुए जलभराव से डरा सहमा मैं किसी तरह कमरे में पहुंचा। तब भाबर में मैं इस स्थिति से गुजर रहा था तो मुझे पहाड़ में रह रहे मेरे परिवार की चिंता सताने लगी। घर कई फोन लगाए लेकिन सिंग्नल नहीं होने के कारण संपर्क नहीं हो पा रहा था। सूचना तंत्र के माध्यम से पता चला कि उस क्षेत्र में बिजली नहीं है और बारिश के बाद से संचार सेवाओं में तकनीकी खामी आई है। दूसरे दिन भी मौसम का हाल कुछ ऐसा ही था हालांकि एक मित्र घर से निकला और सिग्नल में आते ही उसने अपनी, गांव और मेरे परिवार के सकुशल होने की जानकारी दी तो जान में जान आई।

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खबरों से लगातार मौत के आंकड़े बढ़ रहे थे। कहीं पूरा परिवार मलबे की चपेट में आकर काल का ग्रास बन चुका था तो कहीं लोगों के नदी गधेरों में बहने की सूचनाएं आ रही थीं। अखबारों में आपदा के अलावा कुछ था ही नहीं। इस दौरान मुझे कवरेज के लिए अन्य साथियों के साथ तल्ला रामगढ़ के झुतिया गांव जाने के लिए कहा गया। अब तक जो मैं खबरों के माध्यम से देख पा रहा था, उससे मेरा सामना होने वाला था। हमारा चार सदस्यीय दल रामगढ़ के लिए निकल पड़ा। भीमताल पार करने के बाद हमें धीरे-धीरे प्रलय के निशान दिखने लगे थे। कई ऐसी जगह भी देखीं, जहां बीते दिनों आपदा ने कई लोगों की जान ले ली थी। उन घटनाओं पर चर्चा करते हुए हम गागर पहुंचे तो यहां आकर लगा कि पीछे जो देखा वह तो कुछ भी नहीं था। असली दर्द तो अब शुरू हो रहा है। तल्ला रामगढ़ में गाड़ी से उतरने तो पता चला कि खबर और वास्तविकता में कितना अंतर था। जमीनी स्तर पर हालात हमारी कल्पना से भी ज्यादा भयावह थे। ऐसा लगा रहा था मानो, सब कुछ तबाह हो गया हो। मुझे अच्छी तरह से याद है वहां हर चेहरे में खौफ का मंजर दिख रहा था। कई लोगों के आशियाने टूट गए थे तो कई के ढहने की कगार पर पहुंच चुके थे। हर कोई अपना दर्द बयां कर रहा था। कई लोग तो दर्द बताते हुए भावुक हो गए।

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तल्ला रामगढ़ से झूतिया की ओर की सड़क अतिवृष्टि के कारण जगह-जगह बह गई थी। यहां से हमें आगे की करीब 10 किमी के आसपास की दूरी पैदल ही तय करनी थी। आगे बढ़े तो नदी की आवाज सुनाई दी। यह कोई आम दिन होता तो निश्चित ही मुझे नदी अपनी ओर आकर्षित करती लेकिन इन विपरीत हालात में नदी की आवाज मुझे डरा रही थी। पहाड़ पर जगह-जगह से पानी बह रहा था, मानो प्रकृति के कहर के बाद इसे जख्मों से खूब बह रहा हो। गेठिया की सुंदर पहाड़ियों और हरे-भरे वातावरण के बीच जन्मा और पला-बढ़ा मैं हमेशा से ही प्रकृति संरक्षण का पक्षधर रहा हूं। मुझे पहाड़ में अनावश्यक निर्माण और विकास के नाम पर अंधाधुन सड़कों का कटान कतई पसंद नहीं रहा है। इससे कहीं न कई प्रकृति पर प्रतिकूल असर पड़ा है। झूतिया पहुंचे तो यहां सैकड़ों लोग एक जगह एकत्र थे लेकिन फिर भी सन्नाटा पसरा था। जहां हम खड़े थे वहां बीती रोज नौ मजदूरों की मौत हो गई थी और कइयों के शव अब तक नहीं निकाले गए थे।

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इस पूरे वाकिये को करीब एक साल बीतने को आया है, लेकिन जितना मैंने देखा है आपदा के जख्म अब भी हरे हैं। झूतिया गांव तो दोबारा जाना नहीं हुआ, लेकिन जो मैंने अपने गांव और नैनीताल-हल्द्वानी के सफर के दौरान देखा तो हालात ज्यादा नहीं बदले हैं। गेठिया में तब धंसी सड़क अब तक जस की तस है। यहां बचाव के काम होना तो दूर लोगों को सचेत करने के लिए कोई सूचना तक नहीं लगाई गई है। डोलमार के पास दो जगह सड़क आधी बह गई, उस पर भी कोई काम नहीं हुआ है। ये हाल तब है जब जिले का सरकारी तबका मंडल और जिला मुख्यालय नैनीताल के लिए रोजाना इसी मार्ग से गुजरते हैं। सबसे आवश्यक इस मार्ग पर जब अब तक काम नहीं हुआ है तो झूतिया या पहाड़ के अन्य आपदा प्रभावित स्थानों पर चर्चा करना भी पीड़ितों के जख्म को कुरेदने का काम करेगा।”

(साभार वरिष्ठ पत्रकार दीपक सिंह नेगी की फेसबुक वॉल से )

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