18 सितंबर 1880: नैनीताल के इस काले दिन से नहीं ली गई सीख, आज भी अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है शहर।

ख़बर शेयर कर सपोर्ट करें

18 सितंबर साल 1880 का दिन: नैनीताल शहर में यह दिन आज भी उस खौफनाक मंजर की याद दिलाता है। जब यहां आये विनाशकारी भूस्खलन में 151 लोग दफ़न हो गए थे। जिसमें 43 अंग्रेज थे। नैनीताल के मल्लीताल आल्मा लॉज की पहाड़ी में इस दिन इतना भारी भूस्खलन हुआ, जिसने सरोवर नगरी की तस्वीर ही बदल डाली। ऐतिहासिक बोट हाउस क्लब के समीप स्थित नयना देवी मंदिर भी ध्वस्त हो गया था। 

अफसोस की बात यह है कि 142 साल बाद भी इस विनाश के घाव कम नहीं हो रहे हैं, बल्कि समय-समय पर जगह- जगह भूस्खलन के रूप में बढ़ते जा रहे हैं। नतीजा यह है कि नैनीताल का अस्तित्व भी अब पहाड़ों के साथ दरकने की कगार पर जा पहुंचा है।

साल 1880 में 17 सितंबर तक नैनीताल की आबादी 10,054 हो गई थी, जिसमें 2,957 महिलाएं और 7,097 पुरुष थे। लेकिन इसी साल 18 सितंबर के दिन ‘शेर का डांडा’ पहाड़ी में आए कुछ देर के विनाशकारी भू-स्खलन ने मल्लीताल क्षेत्र की तस्वीर को ही बदल कर रख दिया।

यह भी पढ़ें -   वीर चंद्र सिंह गढ़वाली पुण्यतिथि: पेशावर के इस महानायक को बीच सभा में गांधी जी ने टोका- यह गोरखा हैट पहने मुझे डराने के लिए कौन यहां बैठा है?

इस साल सितंबर माह के तीसरे सप्ताह की शुरुआत में नगर में लगातार चार दिन तक मूसलाधार बारिश हुई। उन दिनों नैनीताल में उद्यान, टेनिस कोर्ट और सड़क आदि के निर्माण कार्यों और यहां की पहाड़ियों में अंधाधुंध भू-कटान और पेड़ों को काटे जाने की वजह से प्राकृतिक भू-व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो चुकी थी। इस समय बारिश के पानी के बहाव से नैनीताल के प्राकृतिक मार्ग बंद हो गए थे और जमीन में घुसे पानी को बाहर निकालने का रास्ता नहीं मिलने पर पानी जमीन के अंदर खड्डों में जमा हो गया और इसी बीच आए भूकंप के एक हल्के से झटके से जमीन के भीतर जमा पानी शेर-का-डांडा पहाड़ी के एक बड़े हिस्से को ही अपने साथ तालाब की ओर ले आया, जिससे मल्लीताल कैपिटल सिनेमा और फ्लैट्स वाले हिस्से की पुरानी तस्वीर मलबे में तब्दील हो गई।

यह भी पढ़ें -   68वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में उत्तराखण्ड को मिला मोस्ट फिल्म फ्रेंडली स्टेट का पुरस्कार

इस घटना से तत्कालीन अंग्रेज शासक काफी डर गए थे और उन्होंने तुरंत ही नगर की सुरक्षा के लिए भूगर्भीय सर्वेक्षण के साथ बेरजफोर्ड कमेटी का गठन किया। सबसे पहले अंग्रेजों ने शेर का डांडा जो कि वर्तमान में चाइना पीक है और अयारपाटा के साथ ही बलिया नाला का निर्माण करवाया। इसके बाद 90 के दशक में नगर पालिका की ओर से नगर में कई अन्य नालों का निर्माण करवाया गया। अंग्रेजों ने ही नगर के सुरक्षा दीवार के रूप में बलिया नाला का निर्माण और सुरक्षा के मद्देनजर काम करवाया था। जिसके बाद से बलिया नाला पर मौजूदा सरकार और प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है। जिसका नतीजा यह है कि हर साल बलियानाला में पहाड़ी दरकती है और लोग डरे सहमे सरकारी महकमे की ओर से काम होने का इंतजार करते रह जाते हैं।

यह भी पढ़ें -   चमोली के इस इलाके में रावण को माना जाता है पूजनीय, आज भी रामलीला मंचन की शुरुआत रावण के तप से ही होती है…

नैनीताल के मौजूदा हालातों की बात की जाए तो शहर में ग्रीन बेल्ट क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण और संवेदनशील क्षेत्रों का ट्रीटमेंट नहीं होने से यहां लगातार खतरा मंडरा रहा है। सात नंबर, मॉल रोड, ठंडी सड़क, बैंड स्टैंड और राजभवन मार्ग में लगातार भूधंसाव हो रहा है। लेकिन प्रशासन और सरकार की ओर से अभी तक इसके स्थाई समाधान की योजना केवल कागजों में ही सीमित है। धरातल पर अभी कोई कार्य नहीं दिखाई दे रहा है।

Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments