पढ़िए, क्यों 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाए जाने के पक्ष में नहीं थे लोकप्रिय हिंदी साहित्यकार शैलेश मटियानी…

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अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना में 1931 में जन्मे लोकप्रिय हिंदी कवि शैलश माटियानी 14 सितम्बर के दिन हिन्दी दिवस मनाए जाने को लेकर संतुष्ट नहीं थे। उनका मानना था कि अमीर खुसरो के जन्म दिवस या उनके निर्वाण दिवस पर हिंदी दिवस को मनाया जाना चाहिए। इसके संबंध में उन्होंने 26 साल पहले अपनी पुस्तक के एक लेख में इसकी जानकारी दी थी। हिन्दी दिवस को 14 सितम्बर के दिन नहीं मनाए जाने को लेकर साहित्यकार मटियानी का ये तर्क क्या था चलिए आपको भी स्पष्ट करते हैं।

लोकप्रिय हिंदी कवि और साहित्यकार शैलेष मटियानी हिन्दी भाषा और उसके प्रयोगों को लेकर अत्यधिक संवेदनशील थे। वे हिन्दी के प्रति सरकारों और उनके नौकरशाहों के रवैये से बेहद दुखी थे। इस विषय पर अपनी लेखनी के जरिए कई सवाल छोड़कर 14 साल पहले इस दुनिया को अलविदा कह गए। उन्होंने 26 साल पहले लिखी हिन्दी समर्पित अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रभाषा का सवाल’ में यह प्रश्न उठाया था कि भारत देश में 14 सितंबर को ही हिन्दी दिवस क्यों मनाया जाता है? इसका जवाब इस दिवस पर ही उन्हें इलाहाबाद में एक मंच पर हिंदी के विद्वान डॉ. प्रेमनारायण शुक्ला से मिला। उनके सवाल पर कहा गया कि ‘14 सितंबर 1949 को संविधान समिति द्वारा देश के संविधान में हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा और राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। इसलिए इस दिन को एक महान राष्ट्रीय पर्व की तरह मनाया जाता है।

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लेकिन इस जवाब से असंतुष्ट मटियानी ने डॉ. शुक्ला से पूछा था कि तब हम इसे राष्ट्रभाषा या राजभाषा दिवस के रूप में क्यों नहीं मनाते हैं। उन्होंने तब 14 सितंबर को इस दिवस के रूप में मनाने को लेकर इसे बड़ा शर्मनाक पाखंड करार दिया था। उनका मानना था कि संविधान में इसे राजभाषा का दर्जा तो दिया गया है, लेकिन सरकार ने हमेशा ही छाया भाषा के तौर पर इसे मान्यता दी और सरकारी कामकाज अंग्रेजी भाषा में देख कर उन्हे इस बातपर सख्त ऐतराज था। वह हिन्दी को देश भर में जन-जन की भाषा बनाने के हिमायती थे।

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शायद यही वजह उनके हिन्दी प्रेम का था। 26 साल पहले लिखे एक लेख में मटियानी ने लिखा था कि अमीर खुसरो के जन्म या निर्वाण के दिन को हिन्दी के साथ जोड़ देना चाहिए, मटियानी का कहना था कि खुसरो ने ‘बहुत कठिन है डगर पनघट की गा-गाकर, हिन्दी के भविष्य की डगर को आसान ही नहीं, बल्कि राष्ट्रव्यापी बना दिया। उनका मानना था कि इसकी अहमियत को खुसरो ने बेहतर पहचाना है। जिसके चलते उनका कहना था कि इस दिवस को 14 सितंबर को नहीं बल्कि अमीर खुसरो के जन्म या निर्वाण दिवस पर मनाना चाहिए।

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