हरेला :- जानें हरियाली और देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक हरेला पर्व की मान्यता ।।

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यूं तो देव भूमि उत्तराखंड में कई तीज त्यौहार अपनी अहम भूमिका रखते हैं और हमारी संस्कृति को संजोने और विरासत को हम सभी के बीच बनाए रखने में सहायता करते हैं ऐसा ही एक त्यौहार प्राकृतिक सौंदर्यता और हरियाली प्रतीक हरेला त्यौहार मनाया जाता है कुमाऊं क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण पारंपरिक पर्व हरेला को विशेष रूप से मनाया जाता है हरियाली के प्रतीक हरेला जहां हमारी संस्कृति और विरासत को दर्शाता है तो वही ऐसा माना जाता है कि आज के दिन लगाए गए वृक्ष बेल इत्यादि कभी सूखता नहीं है

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प्रत्येक वर्ष कर्क संक्रांति को मनाया जाने वाला यह त्योहार अपनी अलग पहचान दर्शाता है 9 दिन पहले लोग अपने घर में सात प्रकार के बीज गेहूं जो मक्का चना आदि प्रकार के एक छोटी टोकरी में मिट्टी भरकर बोते हैं जिसे हर रोज पानी से सीता जाता है और दसवे दिन हरेली पर्व के तौर पर इन्हें काटा जाता है सुख समृद्धि और शांति के प्रतीक हरेला त्यौहार को पौराणिक मान्यताओं के अनुसार दसवे दिन सबसे पहले देवी देवताओं को अर्पित करने के बाद घर के वरिष्ठ सदस्य सभी बच्चों के सिर पर हरेला रखकर इस प्रकार आशीर्वाद देते हैं

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जी रया,जागि रया,यो दिन बार, भेटने रया,दुबक जस जड़ हैजो, पात जस पौल हैजो, स्यालक जस त्राण हैजो, हिमालय में ह्यू छन तक,गंगा में पाणी छन तक,हरेला त्यार मानते रया,

वही पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि हरेला जितना ही अच्छा और बड़ा होता है उस वर्ष की फसल की पैदावार भी अच्छी होती है वही देवभूमि उत्तराखंड में आज के दिन कई स्थानों पर मेले का आयोजन होता है साथ ही कई गांव में सामूहिक रूप से भी इस पर्व को मनाया जाता है हरेला पर्व हमारी सांस्कृतिक विरासत को संजो कर रखने और युवा पीढ़ी को हमारी संस्कृति से जोड़े रखने का एक अच्छा त्यौहार है

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